अलौकिकता (Supernaturalism) के लिए ध्यान

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meditation
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कहा जाता है की आप जैसा सोचते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। और जीवन के प्रति यही सोच आपका भाग्य भी निश्चित कर देती है। इस तथ्य को आप अपने हित में उपयोग कर सकते हैं। (Practice enlightenment Meditation)

 

आधुनिक जीवन में हम हमेशा समझ को महत्व देते हैं। पहले बातों को समझा जाता है फिर ही इसपर भरोसा किया जाता है। पर गौर करेंगे तो आप पाएँगे की इस दुनिया में आपने जो भी शुरुआती वर्षों में सीखा है उसपर पहले भरोसा किया है फिर आने वाले वर्षों में इसे जाना है। बचपन में अपनाई गयी इस शिक्षा पद्धति के उपयोग से आप एक गूढ़ ज्ञान को भी सीख सकते हैं।

 

“अहम् ब्रह्म अस्मि” अर्थात मैं ब्रह्म हूँ। ये वाक्य कहता है की मैं ही ये पूरा ब्रह्माण्ड हूँ; हर व्यक्ति जिससे आप मिलते हैं और जिससे कभी नहीं मिलते, हर व्यक्ति जिससे आप प्रेम करते हैं या नफरत करते हैं, ये पूरी प्रकृति आप ही हैं।

 

इस वाक्य को समझना और अपनाना हमारे लिए आसान नहीं। पर अगर हम इसपर भरोसा करें और इसे अपनाएं तो आप इसका अर्थ भी समझ जाएंगे। इसे अपनाकर आप अपने जीवन के दृष्टिकोण में बड़ा फर्क महसूस करेंगे; उस चेतना का अनुभव करेंगे जो आलौकिक और शांतिदायी है।

 

वेदों की इस सीख को कैसे जीवन में उतारा जाए, आइए, विज्ञान भैरव के बताये एक तरीके से सीखते हैं-

 

  1. किसी शांत जगह पर बैठ जाएं। अपनी चेतना को अपने ओर ले कर आएं तथा अपने अंदर चल रहे जीवन को महसूस करें। हम लगातार जीवित रहते हुए भी अक्सर जीवन के साक्षी नहीं बन पाते। इस छुपे हुए एहसास को सामने लाएं।

 

  1. अब, अपने किसी प्रिय व्यक्ति के बारे में सोचें। अपने आप से कहें- “हमारे अनुभव और व्यक्तित्व में सभी फर्क होने के बावजूद भी हम चेतना से एक ही हैं। मूल रूप से हम एक हैं। ” अगर ये बात आप स्पष्टता से नहीं समझ पा रहे तो इस तरह सोचें-“मेरी तरह इस व्यक्ति को भी ख़ुशी की खोज है। मेरी ही तरह इसे भी तकलीफ होती है।” आप जितना अपनी और इस व्यक्ति की चेतना से अवगत होते जाएंगे, उतना ही इसे करीब पाएंगे।

 

  1. अब किसी जान पहचान के व्यक्ति के के बारे में सोचें, जिसके प्रति आपकी भावनाएं निष्पक्ष है। इस व्यक्ति के बारे में भी यही विचार दोहराएं- हम चेतना से एक हैं।

 

  1. अब किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचें जिसे आप पसंद नहीं करते। खुद को याद दिलाएं- “हम कितने ही अलग क्यूँ न हों, एक ही चेतना हम दोनों के अंदर बसती है। मैं जो भी देखता, छूता या सोचता हूँ, वो एक ही चेतन्य उर्जा है। “

 

  1. इस चैतन्य उर्जा का अनुभव करें। इसके दायरा को बढ़ाकर उस दुनिया तक लेकर जाएं जिसे आप जानते हैं तथा जिसे आप नहीं जानते। हर बड़ी और छोटी चीज़ को इसी उर्जा का हिस्सा मानें और अनुभव करें।

 

  1. इसी विचार पर कुछ देर रुकें। हो सकता है आपके मन में कुछ सवाल उठें, इन सवालों के जवाब को ढूंढने का प्रयत्न करें। चाहें तो “अहम् ब्रह्म अस्मि” मंत्र का जाप करें। अपने जीवन के अनुभव को इस सत्य से तौलकर देखें। समझें की क्या ये वाक्य आपके जीवन में चिढ़, गुस्से और डर को खत्म कर सकता है। कुछ क्षण बाद गहरी सांस लेकर आँखें खोल लें।

 

  1. ध्यान के बाद अपने आसन को छोड़ते समय इस विचार को अपने साथ ले जाएं। दिनभर में लोगों से मिलने के दौरान इस विचार के चश्मे से दुनिया को देखने की कोशिश करें। आप चाहें तो -“अहम ब्रह्म अस्मि” का जाप ऐसे समय भी कर सकते हैं।

 

  1. जैसे-जैसे ये विचार आपके जीवन का हिस्सा बनता जाएगा, इसका दायरा बढाते जाइए। अपने अंदर बसी चेतना को किसी जानवर की आँखों में या बढ़ते पौधे में देखें। ऐसा करने पर अपने अंदर उमड़ते एहसास को समझने की कोशिश करें। अगर आप ज्यादा जुडाव महसूस करते हैं या कई भावनाएं महसूस करते हैं तो ऐसे बदलाव का स्वागत करें। इसी राह में आप स्वयं को आलौकिक ज्ञान से भरा पाएंगे।