बच्चों में संवाद संबंधी समस्याएं तथा उनके उपचार

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image credits: SpeechNet Speech Pathology

कई बच्चों को शुरुआत में बातचीत करने में समस्या आती है। ज्यादातर बच्चों में जहाँ ये समय के साथ खत्म हो जाती है वहीं कई इनसे जूझते ही रह जाते हैं। बोली के इन विकारों के कई रूप होते हैं जिन्हें समझकर माता-पिता अपने बच्चे के विकास में मदद कर सकते हैं। (haklane ka ilaj hindi me, speech disorders in children)

 

आइये, बच्चों में पाए जाने वाले इन विकारों को समझें-

 

ध्वनी विकार-

शब्दों के उच्चारण में ध्वनि का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। अगर बच्चे में ध्वनी विकार है तो उसे शब्द से जुड़ी सटीक ध्वनि निकालने में समस्या होगी।

इसके तीन प्रकार होते हैं-

लोप : इस विकार में बच्चा शब्द की कुछ ध्वनि छोड़ देता है। जैसे वो “मैं बस में स्कूल जा रहा हूँ” की जगह “मैं ब में स्कू जा रा हूँ” बोल सकता है।

प्रतिस्थापन : बच्चा मुश्किल ध्वनि की जगह दूसरी ध्वनि का उपयोग करने लगता है। जैसे “मैंने आसमान में सूरज देखा” की जगह वह “मैंने आमान में फुरल देखा” बोल सकता है।

विरूपण : इस विकार में बच्चा सही ध्वनि निकालने की कोशिश तो करता है लेकिन सही से नहीं कर पाता। इस वजह से वो तुतला सकता है, ‘स’ की ध्वनि में सीटी निकल सकती है या जीभ दांतों के बीच आ सकती है।

 

बच्चों में ध्वनी विकार की वजहें अक्सर स्पष्ट नहीं होती। लेकिन कुछ विकार की दो वजहें मानी जाती हैं-

अप्रक्सिया: इस समस्या में बच्चे की जीभ और होंठ मनचाहे रूप से हिलते नहीं हैं जिस वजह से सही ध्वनी नहीं बन पाती।

डिसअर्थ्रिया: इस समस्या में बच्चे के मुँह के कुछ हिस्से लकवाग्रस्त होते हैं या कमज़ोर होकर सामंजस्यपूर्ण रूप से काम नहीं पाते।

 

आपके बच्चे को ध्वनि विकार है या नहीं तथा क्या आपको चिंतित होना चाहिए, यह जानने के लिए बचपन से ही उसके संवाद सम्बंधी व्यवहार पर नजर रखें। उसे चिकित्सक से मिलाइए, अगर वह-

  • 8 या 9 महीने का होने पर भी ‘ब’, ‘म’ आदि नहीं बोल रहा।
  • 12 महीने का होने पर भी ‘मामा’, ‘पापा’ नहीं बोल रहा।
  • 18 महीने का होने पर भी वह सिर्फ ‘आ’ ‘ऊ’ ही बोल पा रहा है।
  • 3 साल का होने पर ही अनजाने लोगों की बात नहीं समझ पा रहा।
  • 4 साल का हो जाने पर आपको उसकी बातें समझ नहीं आ रही।
  • 6 साल की उम्र तक वह ज्यादातर शब्द नहीं बोल पा रहा।
  • 6-7 साल की उम्र में उच्चारण सही नहीं है।
  • अगर अपनी बोली को लेकर निराश या झुंझलाया हुआ रहता है।

 

प्रवाह के विकार (हकलाना)

बातों को प्रभावी ढंग से रखने के लिए उसका स्वतः प्रवाहित होना ज़रूरी है। अगर बच्चा बोलते समय अटकता या ज्यादा समय लेता है तो वह प्रवाह के विकार से ग्रसित हो सकता है। ऐसा होने पर उसके चेहरे पर तनाव उभर सकता है या वह मुट्ठी बांध सकता है या उसके पैर अकड सकते हैं। इसकी वजह बहुत साफ़ नहीं है पर विशेषज्ञ इसे वातावरण में अनचाहे ततक बताते हैं।

अगर आपका बच्चा इस विकार से ग्रसित है तो ध्यान दें। देखा जाता है की मस्तिष्क की प्रवृत्ति का सख्त विरोध करने पर कई समस्याओं के साथ प्रवाह का विकार भी उत्पन्न हो सकता है। पुराने समय में उलटे हाथ का उपयोग करने वाले बच्चे को सीधा हाथ उपयोग करने के लिए दबाव बनाया जाता था जिससे उसके शरीर में ऐसे ही विकार उत्पन्न हो सकते थे। ऐसी ही कई प्रवृत्तियां होती हैं जो बचपन से बच्चे के व्यवहार का हिस्सा है और आपको उसे बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

 

बच्चे को चिकित्सक से मिलाएं, अगर-

  • वह अटक-अटककर बात करता है।
  • बोलते समय तनाव महसूस करता है।
  • बोलने से कतराता है।
  • खुद को हकलाने वाला मानता है।

 

विकार के उपचार

बच्चों में संवाद सम्बंधी विकार को जल्द पकड़ना बहुत ज़रूरी है। बच्चा जब तक 2-4 साल का नहीं हो जाए, उसकी बोली पर ध्यान दें और किसी लक्षण को लेकर संदेह हो तो चिकित्सक से चर्चा करें। बच्चे को भी उपचार पर भरोसा दिलाएं। चिकित्सक से उपचार में अपनी भूमिका पर भी बात करें। इसके अलावा बच्चे को कई ऐसे खेलों का हिस्सा बनाएं जिससे उसकी बोली भी सुधरे तथा उसका आत्मविश्वास भी बढ़े।